Google वेब प्राइमरी का मास्टर

23.9.10

बच्चा यह महसूस करे कि उसकी हर बात सुनी जायेगी

........पिछली कड़ी में हम बच्चों की बातों पर ध्यान केन्द्रित करने के सम्बन्ध में चर्चा कर चुके हैं| .....उससे आगे बढ़ते हुए कह सकते हैं कि प्राथमिक स्तर में आते आते बच्चे दिए गए संदेशों को कार्य-रूप में परिणित करने की क्षमता हासिल कर चुके होते हैं .......जोकि उन्ही के प्रयासों से ही संभव हुआ होता है|


.......जाहिर है! इस क्षमता को हासिल करने में अब तक की गयी घरेलू बातचीत की ही अहम भूमिका होती है| बच्चा अपने जीवन में , अपने परिवेश से यह सब सीखता है ......और इस रूप में अपने अनुमानों को सक्रिय करना सीखने लगता है| इस अधिगम (LEARNING) को हासिल करने के बाद बच्चा अचानक विद्यालय में इसी साधन (बातचीत) की सबसे अधिक उपेक्षा देखता है ..... परिणाम-स्वरुप वह अधिकाँश रूप में सहमा और और अपनी स्वाभाविक चेष्टाओं को दमित करने को मजबूर होता है| सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में अधिकाँश रूप  में आप बच्चों को इसी दशा में पायेंगे .......हालांकि  बाल मनोविज्ञान में असमर्थता के अलावा अध्यापकों की पर्याप्त संख्या में ना होना भी इस दशा को अंतहीन रूप से उत्प्रेरित करने का  जिम्मेदार कारक हैं| 
इस रूप में मेरी मान्यता है कि वर्तमान शैक्षिणिक माहौल में बातचीत को प्रमुख शिक्षण सामग्री के रूप में प्रोत्साहित करने की सबसे अधिक आवश्यकता और संभावनाएं हैं| इस बातचीत की प्रक्रिया में अध्यापक की भूमिका  केवल नियमन और उत्प्रेरण तक ही सीमित होना चाहिए| 

साधारण रूप में अगर बच्चों की आपसी बातचीत को समझाने की कोशिश करें तो पाया जा सकता है कि निम्न  रूप में बच्चे अपनी क्रियाओं और चेष्टाओं को सक्रिय रखते हैं:- 
  • बातचीत का सबसे बड़ा आधार अचानक किसी नयी चीज पर ध्यान देने से प्रारम्भ होता है|
  • वह अनूठी चीज जो उसने पहली बार देखी| 
  • इस प्रक्रिया में बच्चे की सभी ज्ञानेन्द्रियाँ सक्रिय होती हैं|
  • उस चीज पर अपने मस्तिष्क को सबसे अधिक सक्रिय करना|
  • सभी बच्चों द्वारा अपने अपने पर्यवेक्षण (OBSERVATION) पर ही परस्पर चर्चा|
  • पुराने अनुभवों से नए अनुभवों की तुलना और उन्हें  क्रम-बद्ध रूप में सजोने की कोशिश|-
  • अपने पर्यवेक्षण पर डटे रहने की प्रवत्ति|
  • और उस पर सहमत करने के लिए तर्क(...कभी कभी कुतर्क भी)|
  • पूर्वज्ञान की अनोखी कसरत|
  • अपने तर्क पर ही पिछले अनुभव से तुलनात्मक चितन और मनन करना |
  • तर्कों को व्यवस्थित करने की प्रक्रिया में कल्पनाओं का सहारा लेना|


उपरोक्त बिन्दुओं पर ध्यान दें तो बातचीत के क्रम में आपने महसूस किया होगा कि बच्चों की किस रूप में बौद्धिक कसरत होती है| जाहिर है इतनी कसरत के लिए कुछ आप (अध्यापक) को भी करना पडेगा| दो बातें सबसे महत्वपूर्ण हैं ....

  • विद्यालय का प्रत्येक बच्चा यह महसूस करे कि उसकी हर बात सुनी जायेगी|
  •  ...और ....
  • बच्चों को भरोसा हो कि उनका बोलना और बतियाना अध्यापक को अच्छा लगता है|

(क्रमशः जारी .....)

19.9.10

.........विद्यालय आते आते यह विचारधारा पूरी तरह से पलटी खा जाती है |

कल अपने विद्यालय में मिड डे मील आईवीआरएस (IVRS) से आये हुए फ़ोन काल को निबटा रहा था ....तो दो बच्चों की आपसी बातें सुन कर बड़ा अच्छा लगा| बहरहाल उनकी बातें मेरे मोबाइल से जुडी सामान्य जिज्ञासाओं से सम्बंधित थी| उन्हें बुलाकर अपना मोबाइल पकड़ा कर कुछ समझाया | यह लेख उस "बातचीत" को और उसके पीछे जुडी जिज्ञासाओं को "सबसे प्रभावोत्पादक साधन" के रूप में  प्रतिष्ठित करता है | 
(इस लेख का कुछ आधार सतीश पंचम और अरविन्द जी के हालिया बौद्धिक विमर्श पर भी आधारित है |)


सामान्य रूप से हमारे  विद्यालयों में बात-चीत करने को हेय दृष्टि से देखा जाता है | माना जाता है कि यह बातचीत क्लास रूम से बाहर की चीज है | जाहिर है अपनी अभिव्यक्ति को जाहिर करने वाले इस सबसे महत्त्व-पूर्ण साधन की हम सब अब तक इस विद्यालयी व्यवस्था में उपेक्षा ही करते आयें हैं| माना जाता है कि विद्यालयों में बातचीत करना पढ़ाई  ना करने का दूसरा रूप है | बच्चे बातचीत को सबसे अधिक स्वतंत्र मध्यावकाश या अध्यापक के कक्षा में ना रहने की स्थिति में ही होते हैं|

सामान्य रूप से हम सब अपने घर में बच्चे के पालन -पोषण में "बातचीत" करने को जितना महत्वपूर्ण समझते हैं .........विद्यालय आते आते यह विचारधारा पूरी तरह से पलटी खा जाती है | बात-चीत को लेकर हमारी अवहेलना के कारण हम इस सबसे बड़े सामर्थ्यवान साधन की संभावनाओं को अब तक नहीं दोहन कर सके हैं |बातचीत को विशेष रूप से प्राथमिक स्तर के बच्चों के स्तर में सीखने और सीखी हुई चीजों को और अधिक परिपक्व बनाने के लिए हर संभव रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए | 

जाहिर है बातचीत एक ऐसा साधन है जिसके लिए आपको कोई खर्च नहीं करना ...खासकर उस दशा में जहाँ हम अब तक प्राथमिक स्तर पर सुविधाएं नहीं उपलब्ध नहीं करवा सके हैं| मेरी अपनी मान्यता के अनुसार ऐसा विद्यालय  बड़ा ही बोरिंग और मनहूस लगता होगा ? बातचीत को लेकर यह आरोप लगाया जा  सकता है कि हमेशा बातचीत के उद्देश्य प्रभावी और बाल-उपयोगी  नहीं हो सकते है ....पर फिर भी अध्यापक के मार्ग-निर्देशन और अगुवाई में बच्चे सीखने की उन संभावनाओं को टटोल सकेंगे ...जिनकी हम सब अपेक्षा रखते हैं | 

इस रूप में एक अच्छे श्रोता के रूप में अध्यापक का महती दायित्त्व उस बातचीत के परम उद्देश्यों और बातचीत के कारण उपजी सीखने की संभावनाओं को दिशा देने का है | बातचीत की इन संभावनाओं के लिए सबसे पहले  जरूरी है हम सब बच्चों की बात को सुनने की आदत डालें| ...हालांकि यह कहना आसान है ...पर इसे करना उतना ही मुश्किल क्योंकि हम अध्यापक यह मानकर चलते हैं कि हमारा काम बच्चों को निर्देश देना  है ...और बच्चों का काम केवल सुनना | यह पूर्वाग्रह हमें बातचीत के केवल एकाकी मार्ग पर ही चलने को बाध्य करता है.........जिसमे केवल बच्चों को सुनाना है ......सुनना नहीं | 

बच्चों की बातचीत को शिक्षण सामग्री के रूप में इच्छुक अध्यापक का सबसे पहले दायित्त्व यही होना चाहिए कि वह सबसे पहले इस बातचीत के लिए प्रोत्साहनयुक्त माहौल निर्मित करे|


(क्रमशः जारी ....)