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27.4.09

कान्वेंट स्कूलों के संस्कार क्या अब सच में बदलने वाले हैं?


अंग्रेजियत के लिए जाने जाने वाले कान्वेंट स्कूलों के संस्कार क्या अब सच में बदलने वाले हैं। पोप बेनेडिक्ट सोलहवें की प्रार्थना सभा में गीता का सार गूंजने के साथ ही कई स्कूलों ने अपने कार्यक्रमों में भारतीय संस्कारों को अब अधिक महत्व देने की पहल की है। इसके तहत बच्चों का विद्यारंभ संस्कार भी किया जायेगा। इसकी शुरुआत इलाहाबाद के प्रतिष्ठित सेंट मेरीज स्कूल ने की है। यहां पहली बार कुछ दिनों पहले विद्यारंभ संस्कार आयोजित किया गया है। इलाहाबाद डायसिस के स्कूलों के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है।

गौरतलब है कि भारतीय परंपराओं पर आधारित सरस्वती विद्यालयों में (हिन्दी माध्यम)विद्यारंभ की समृद्ध सनातन परंपरा रही है। विद्यालयों में प्रवेश के प्रथम दिन छात्र-छात्राओं का पट्टी पूजन होता है। लेकिन अंग्रेजियत से लबरेज कान्वेंट स्कूलों में अभी विद्यारंभ की परंपरा नगण्य है। भारतीय संस्कृति के षोडससंस्कार में शामिल विद्यारंभ संस्कार के तहत बच्चों को पूरे विधिविधान के साथ अक्षराम्भ कराया जाता है। तिलक रोचना लगाकर शुभ मुहूर्त में उसे कुछ लिखने को प्रेरित किया जाता है।



उल्लेखनीय है कि मसीही समाज व डायसिस के स्कूलों में अनुशासन का तो बोलबाला रहता है लेकिन 'विद्यारंभ' जैसी सनातन परंपराएं बहुत कम या ना के बराबर है। ऐसे में सेंट मेरीज नर्सरी स्कूल का विद्यारंभ शुरू करने का फैसला चौंकाने वाला है। स्कूल की प्राचार्या सिस्टर फ्लोरेंस के अनुसार विद्यारंभ संस्कार संपन्न कराने के लिए इन्दौर से डायरेक्टर पुरोहित कुन्नत पुरोहित को बुलाया गया है। उन्होंने बताया कि पूर्व प्राविन्सियल सुपीरियर सिस्टर मैरिएट व प्राविन्सियल सुपीरियर सिस्टर सुमिता की प्रेरणा के चलते इस संस्कार को प्रारंभ करने का निर्णय लिया गया है। सर्वधर्म प्रार्थना सभा व मंत्रोच्चार भी होगा। इसी क्रम में 16 अप्रैल को मेजा स्थित एसएमसी ब्रांच में भी विद्यारंभ संस्कार संपन्न होगा।

क्या है विद्यारंभ संस्कार ?

भारतीय संस्कार में विद्यारंभ की शास्त्रीय मान्यता है। इसके अन्तर्गत पूरे विधिविधान से बच्चे को अक्षरांभ कराया जाता है। आचार्यों के अनुसार शास्त्रोक्त मान्यताओं अनुसार बच्चे का 5वें वर्ष अक्षरांभ कराया जाता है। कुछ लोग तीन वर्ष में ही इस संस्कार को संपन्न कराते हैं। सोम, बुध, बृहस्पति व शुक्रवार या फिर किसी पूर्णातिथि और शुभ मुहूर्त में विद्यारंभ कराया जाता है। इसके तहत पट्टी पूजन व मंत्रोच्चार का विधान है। कुल देवता व भगवान गणेश व मां सरस्वती की आराधना की जाती है।

17.4.09

कहीं आपका टास्क मैनेजर DISABLED तो नहीं ?

अभी अपने तकनीकी ब्लॉगर विनय प्रजापति की ताज़ी पोस्ट पढ़ रहा था तो पहली ही टिप्पणी अपने सुरेश चिपलूनकर की पढी जिसमे उन्होंने अपने कम्पूटर के ALT+CTRL+DELETE को दबाने पर YOUR WINDOWS TASK MANAGER IS DISABLED BY YOUR ADMINISTRATOR संदेश आने की सूचना दी । (शायद -पत्र से विनय जी ने सुरेश जी को समाधान भेज दिया है । ) तो अपुन के मन में आया कि यह जानकारी क्यों अपने वर्चुअल दुनिया के साथियों से बाँटीं जाए , जिससे सभी का भला होआख़िर तकनीकी झमेले हर किसी के बस के जो नहीं?

हम लोग कई प्रकार की कम्पूटर की समस्यायों से बाहर निकलने के लिए अक्सर ALT+CTRL+DELETE दबाते हैं जिससे टास्क मैनेजर की खिड़की खुल जाती है , और इसके माध्यम से हमकई तरह की चल रही प्रोसेस को नियंत्रित कर सकते हैं - जैसे किसी NOT RESPONDING PROCESS को समाप्त करना , HANG हो चुके कम्पूटर को फ़िर से चालू करना , सारी प्रक्रियायों को देखना , आदि आदिकहने का आशय यह कि यह हमारे कम्पूटर के लिए और हमारे लिए इस खिड़की का खुलना हमेशा अच्छा रहता है



तो चलिए पहले समझते हैं कि आख़िर क्यों आपका WINDOWS TASK MANAGER अक्षम हो जाता हैदरअसल यह स्थिति कम्पूटर के रजिस्ट्री की (VALUE ) मूल्य में वायरस के कारण परिवर्तन आने केकारण होता हैरजिस्ट्री में परिवर्तन करके टास्क मैनेजर को पुनः सक्षम किया जा सकता हैपर आमकम्पूटर प्रयोक्ता के लिए यह करना मुश्किल ही नहीं बल्कि खतरे से खाली भी नहीं हो सकता ?

तो फ़िर आख़िर क्या उपाय हो?
तो हाजिर है

यह ऐसा प्रोग्राम है जिसको आप डाउनलोड करके टास्क मैनेजर को ENABLE या सक्षम कर सकते हैं मईपिछले एक वर्षा से इसे इस्तेमाल कर रहा हूँ .....अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि कोई दिक्कत पेश नहींआयी हालाँकि द्विवेदी जी जी की सलाहों के अनुसार स्पष्टीकरण (Disclaimer) भी लगा दिया गया है इसे आप इस लिंक से डाउनलोड कर सकते हैं अधिक जानकारी के लिए इस लिंक का अध्ययन करें


स्पष्टीकरण (disclaimer): उपर्युक्त लेख में दी गई जानकारी की कोई गारंटी नहीं है, यह जैसी है वैसी ही दी जा रही है। यहाँ मौजूद जानकारी का प्रयोग अपनी ज़िम्मेदारी और समझ पर करें। किसी भी नुकसान के लिए "प्राइमरी का मास्टर "जिम्मेदार नहीं होगा ।

16.4.09

स्कूल नाईट क्लब या शराबखाने तो नहीं?

सब जानते हैं कि आख़िर बच्चे तो बच्चे हैं। फिर चाहे वे स्कूल में हों, घर पर या खेल के मैदान में। जहां बच्चे होंगे वहां शोरगुल तो होगा ही और उनकी शैतानियां भी। लेकिन इस ख़बर के अनुसार लगता है कि ब्रिटेन के मिडलैंड्स के एक स्कूल को बच्चों यही सब शरारतें कुछ ज्यादा ही भारी पड़ने लगी हैं। तभी तो बच्चों को बिलकुल शांत रखने के लिए स्कूल के प्रशासन ने बाउंसरों व पूर्व सैन्यकर्मियों को नियुक्त किया है।


दरअसल क्लब, पब और बियर बार में तैनात हट्टे-कट्टे सुरक्षाकर्मियों को बाउंसर कहा जाता है। जिनका काम किसी प्रकार की अराजकता व अव्यवस्था को रोकना होता है। स्कूल ने एक एजेंसी से संपर्क कर बाउंसरों की भर्ती भी कर ली है। इनका काम सिर्फ बच्चों की निगरानी करना ही नहीं होगा, बल्कि टीचर की अनुपस्थिति में बच्चों को शांत रखने की जिम्मेदारी भी इनकी होगी। उधर, नेशनल यूनियन आफ टीचर्स ने प्रशिक्षित बाउंसरों की नियुक्ति पर आपत्ति जताते हुए हर क्लास को एक प्रशिक्षित टीचर देने की मांग की।

कामडेन के गणित के शिक्षक एंड्रयू बैसले ने कहा कि यह विचार बच्चों की पढ़ाई से ज्यादा उन पर नियंत्रण रखने से जुड़ा लगता है। बाउंसर होने का मतलब है कि आप कठोर और तेज आवाज वाले हैं। मैं बाउंसर का प्रशिक्षण लेकर शिक्षक बनने के खिलाफ नहीं हूं। लेकिन यदि आप टीचर बनना चाहते हैं तो आपको बच्चों के साथ पेश आने का सलीका आना चाहिए। बैसले के अनुसार बाउंसरों को बच्चों के साथ पेश आने का सलीका नहीं सिखाया जाता। उन्होंने बताया कि इतने कम दिनों में ही एक बाउंसर को नौकरी से निकलना भी पड़ा है। उसने स्कूल के एक स्टाफ के साथ बदतमीजी की थी।


इस ख़बर पर अब क्या कहा जाए ? अभी तक तो हम अपने भारत में इन तरीकों पर उंगली उठा रहे थे ....परअब विकसित देशों में भी ऐसे हालात हैं ...... तब तो और गंभीरता से हमें सोचना पड़ेगा ?

मैं मानता हूँ कि किसी भी कार्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए व्यवस्था का होना अति आवश्यक है। कक्षा व्यवस्था शैक्षिक कार्यक्रमों की धुरी है। अत: इसी के आधार पर अध्यापक एवं बच्चों के बीच रिश्ता बनता है, एक दूसरे को आपस में समझने का अवसर मिलता है तथा पढ़ाई का भी माहौल बनता है। कहा जाता है कि - शिक्षा के क्षेत्र में जैसी कक्षा व्यवस्था होगी वैसा ही शिक्षण कार्य होगा। नये निर्धारित क्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरानी चली रही पारम्परिक व्यवस्था से हट कर कुछ नई व्यवस्था बनानी चाहिए। पर व्यवस्था के नाम पर बाउंसरों की तैनाती ???

(समाचार साभार लिंक )

14.4.09

स्कूली बच्चों की सुरक्षा से सम्बंधित अहम फैसला

स्कूली बच्चों की सुरक्षा से सम्बंधित अहम फैसला सुनाते हुए देश के उच्चतम न्यायालय ने छह माह के अन्दर के सभी सरकारी व निजी स्कूलों में अग्निशमन उपकरण लगाए जाने का तुंरत आदेश दिया है।

कोर्ट ने सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के शिक्षा सचिवों को अग्निशमन उपकरण लगाने के बाद एक माह के भीतर जरूरी हलफनामा दाखिल कर आदेश पर अमल की जानकारी देने का भी निर्देश दिया है।


माननीय न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी व लोकेश्वर सिंह पंटा की पीठ ने स्कूली बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर यह अहम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका अविनाश मेहरोत्रा ने मद्रास के लार्ड कृष्णा स्कूल में 93 बच्चों की जल कर हुई मौत की घटना के बाद दाखिल की थी।ध्यान रहे की यह घटना कुछ समय पहले हुई थी ।

सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि सभी राज्य सरकारें व केंद्र शासित प्रदेश स्कूलों को मान्यता या पंजीकरण देने से पहले यह सुनिश्चित करें कि स्कूल की इमारत हर तरह से सुरक्षित है। इमारत का निर्माण नेशनल बिल्डिंग कोड आफ इंडिया के सुरक्षा मानकों के मुताबिक हुआ है। सभी सरकारी व निजी स्कूलों में छह माह के भीतर अग्निशमन उपकरण लगाए जाएं। पीठ के कहा है कि स्कूल की इमारतों में ज्वलनशील सामग्री नहीं रखी जाए और अगर ऐसी सामग्री स्कूल में रखना जरूरी ही है तो उसे सुरक्षित ढंग से रखा जाए।

अदालत ने आदेश दिया कि समय-समय पर स्कूलों की इमारतों का निरीक्षण कराया जाए। निरीक्षण करने वाले इंजीनियर नेशनल बिल्डिंग कोड के पालन के बारे में सख्त होंगे और इमारत का निरीक्षण करने के बाद ही सुरक्षा प्रमाणपत्र जारी करेंगे। कर्तव्य निर्वहन में कोताही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ तत्काल अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि अध्यापकों व स्कूल स्टाफ को अग्निशमन उपकरणों के प्रयोग के बारे में समुचित प्रशिक्षण दिया जाए।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ये सुरक्षा उपाय राज्यों द्वारा उठाए गए सुरक्षा उपायों के अतिरिक्त होंगे। जनहित याचिका में लार्ड कृष्णा स्कूल व डबवाली कांड आदि में स्कूली बच्चों की जलने से हुई मौत की घटनाओं का हवाला देते हुए स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए समुचित नीति तय किए जाने की मांग की गई थी। अदालत ने अपने फैसले में विभिन्न राज्यों द्वारा स्कूलों की सुरक्षा के संबंध में उठाए गए कदमों को भी दर्ज किया है।

वैसे ज्यादातर शिकायतें निजी स्कूलों के बारे में सुनाई पड़ती रही हैं , लेकिन नियामक एजेंसियों के नकारेपन की वजह से किसी प्रकार की रोक अब तक नहीं दिखायी पडी है । चलिए उम्मीद करते हैं की शायद अब कुछ आँख खुले ?