साहस या शक्ति न दे वह शिक्षा किस काम की... ?

6
.........शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जो राष्ट्र के नौजवानों के विचारों में क्रान्ति कर दे।


परन्तु दुर्भाग्यवश शिक्षा की वर्तमान प्रणाली की रचना कुछ इस तरह की है कि उसका हमारी परिस्थिति के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है और उससे जो कुछ मिलता है वह भी राष्ट्र के बहुत थोड़ी संख्या के लड़के-लड़कियों को मिलता है। इसलिए इस शिक्षा का प्रभाव परिस्थिति पर कुछ भी पड़ता हो, ऐसा नहीं दिखता।

इस बुराई को यदि और किसी प्रकार कम किया जा सकता हो तो अवश्य कीजिए। मगर मुझे तो साफ दिखाई पड़ता है कि यह तथा अन्य बुराइयां ऐसी हैं जिनके बारे में सफलतापूर्वक कुछ भी कर सकने के लिए हमारी शिक्षा की पद्धति वर्तमान में देश की शीघ्रातिशीघ्र बदलती हुई परिस्थिति का सामना करने की शक्ति रखनेवाली होनी चाहिए।...जो हमारी नीति की भावना को धिक्कारने लायक लगता है उसका विरोध करने की भी जो शिक्षा विद्यार्थियों को साहस या शक्ति न दे वह शिक्षा किस काम की... ?

जो शिक्षा इतनी शक्ति सम्पन्न हो कि वह विद्यार्थियों की भीतरी शक्तियों का विकास कर जीवन के प्रत्येक क्षेत्रा में उठनेवाली समस्याओं का समाधान करे, वही शिक्षा अमूल्य है।
महात्मा गांधी


हरिजन बन्धु, 31-5-1936 शिक्षण और संस्कृति, पृष्ठ-138




Post a Comment

6Comments
  1. .........शिक्षा इस प्रकार की होनी चाहिए जो राष्ट्र के नौजवानों के विचारों में क्रान्ति कर दे।
    महात्मा गांधी
    को नमन।
    प्रवीण त्रिवेदी जी।
    लेख प्रासंगिक है, पर....
    संसद दागदार है,
    इसलिए......।
    सिर्फ महात्मा गांधी को नमन.........।

    ReplyDelete
  2. जबकि आज इसका ठीक उलटा हो रहा है, अशि्क्षित या ग्रामीण तबका अन्याय-अत्याचार-घूसखोरी के खिलाफ़ जागरूक होकर आवाज़ भी उठा रहा है, लेकिन शहरी पढ़े-लिखे "हमे क्या करना है" की तर्ज पर चुप्पी साध लेते हैं और दुराचार बढ़ता जा रहा है…। शिक्षा लेने भर से जागरूकता आती हो ऐसा नहीं है। और यह देश का दुर्भाग्य है मास्टर साहब।

    ReplyDelete
  3. जिस शिक्षा मै सिर्फ़ नोकरी को ही सब माना जाये, वो तो ऎसी ही होगी, जितना गुड डालो गे मिठा भी ऊतना ही अयेगा, आज कि शिक्षा बस डिग्री लेने तक है, किसी भी तरह से डिग्री मिल जाये, फ़िर बच्चा किसी विदेशी कम्पनी मे १५, से १८ घण्टे काम करे गुलामो की तरह से, बेटा की जिन्दगी जाये भाड मै कुछ साल पेसा तो आयेगा ना, ओर इस शिक्षा मै ना संस्कार है, न देश प्रेम.बस किसी भी तरह से कमाई की जाये...... पेसा पेसा ओर पेसा कमाया जाये.
    धन्यवाद

    ReplyDelete
  4. आज के हालात तो आप देख ही रहे हैं?

    रामराम.

    ReplyDelete
  5. शिक्षा पर बापू के विचार पूज्य हैं। पर उनकी बुनियादी शिक्षा की अवधारणा में नई तकनीक का जो विरोध झलकता है - वह करेक्ट होना चाहिये।

    ReplyDelete
  6. गाँधी जी के विचार सराहनीय हैं।लेकिन अब यह नजर नही आते।

    ReplyDelete
Post a Comment