अक्षर-ज्ञान से दुनिया को लाभ के बजाय हानि होती है?

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शिक्षा का अर्थ

शिक्षा का अर्थ क्या है? अगर उसका अर्थ केवल अक्षर-ज्ञान ही हो, तो वह एक हथियार रूप बन जाती है। उसका सदुपयोग भी हो सकता है और दुरुपयोग भी। जिस हथियार से ऑपरेशन करके रोगी को अच्छा किया जाता है, उसी हथियार से दूसरों की जान भी ली जा सकती है। अक्षर-ज्ञान के बारे में भी यही बात है।


बहुत से लोग उसका दुरुपयोग करते हैं। यह बात ठीक हो तो यह साबित होता है कि अक्षर-ज्ञान से दुनिया को लाभ के बजाय हानि होती है। शिक्षा का साधारण अर्थ अक्षर-ज्ञान ही होता है। लोगों को लिखना, पढ़ना और हिसाब करना सिखाना मूल या प्रारंभिक शिक्षा कहलाती है।

एक किसान ईमानदारी से खेती करके रोटी कमाता है। उसे दुनिया की साधारण जानकारी है । माता-पिता के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए, अपनी पत्नी के साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए, लड़के बच्चों के साथ किस तरह रहना चाहिए, जिस गांव में वह रहता है वहां कैसा बर्ताव रखना चाहिए, ये सब बातें वह अच्छी तरह जानता है। वह नीति यानी सदाचार के नियम समझता है और पालता है उसे अपनी बात सही करना नहीं आता। ऐसे आदमी को आप अक्षर ज्ञान किस लिए देना चाहते हैं?


अक्षर ज्ञान देकर उसके सुख में और क्या बढ़ती करेंगे? क्या उसकी झोंपड़ी या उसकी हालत के प्रति उसमें आपको असंतोष पैदा करना है? ऐसा करना हो तो भी आपको उसे पढ़ाने-लिखाने की जरूरत नहीं।

पश्चिम के तेज से दबकर हम यह सोचने लगते हैं कि लोगों को शिक्षा देनी चाहिए, पर इसमें हम आगे-पीछे का विचार नहीं करते। अब उच्च शिक्षा को लें। मैंने भूगोल विद्या सीखी। बीजगणित भी मुझे आ गया। भूमिति का ज्ञान मैंने हासिल किया। भूगर्भ शास्त्रा को रट डाला। पर उससे हुआ क्या? मेरा क्या भला हुआ और मेरे आस-पास वालों का मैंने क्या भला किया? इससे मुझे क्या लाभ हुआ?

अंग्रेजों के ही एक विद्वान हक्सले ने शिक्षा के बारे में यह कहा है :
उस आदमी को सच्ची शिक्षा मिली है, जिसका शरीर इतना सधा हुआ है कि उसके काबू में रह सके और आराम व आसानी के साथ उसका बताया हुआ काम करे। उस आदमी को सच्ची शिक्षा मिली है, जिसकी बुद्धि शुद्ध है, शांत है और न्यायदर्शी है। उस आदमी ने सच्ची शिक्षा पायी है, जिसका मन कुदरत के कानूनों से भरा है और जिसकी इंद्रियां अपने वश में हैं। जिसकी अंतरवृत्ति विशुद्ध है और जो नीच आचरण को धिक्कारता है तथा दूसरों को अपने जैसा समझता है। ऐसा आदमी सचमुच शिक्षा पाया हुआ माना जाता है, क्योंकि वह कुदरत के नियमों पर चलता है। कुदरत उसका अच्छा उपयोग करेगी और वह कुदरत का अच्छा उपयोग करेगा।


अगर यही सच्ची शिक्षा हो, तो मैं सौगन्ध खाकर कह सकता हूं कि अगर मैंने जो शास्त्र गिनाये हैं, उनका उपयोग मुझे अपने शरीर या इन्द्रियों पर काबू पाने में नहीं करना पड़ा। इस तरह प्रारंभिक शिक्षा लीजिए या उच्च शिक्षा लीजिए, किसी का भी उपयोग मुख्य बात में नहीं होता , उससे हम मनुष्य नहीं बनते।

इससे यह नहीं मान लेना चाहिए कि मैं अक्षर ज्ञान का हर हालत में विरोध करता हूं। मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि उस ज्ञान की हमें मूर्ति पूजा नहीं करनी चाहिए। वह हमारे लिए कोई कामधेनु नहीं है। वह अपनी जगह शोभा पा सकता है। और वह जगह यह है कि जब मैंने और आपने इन्द्रियों को वश में कर लिया हो और जब हमने नैतिकता की नींव मजबूत बना ली हो, तब यदि हमें लिखना-पढ़ना सीखने की इच्छा हो, तो उसे सीख कर हम उसका सदुपयोग जरूर कर सकते हैं। वह गहने के तौर पर अच्छा लग सकता है।

लेकिन यदि अक्षर ज्ञान का यह उपयोग हो, तो हमें इस तरह की शिक्षा लाज़मी तौर पर देने की जरूरत नहीं रह जाती। उसके लिए हमारी पुरानी पाठशालाएं काफी हैं। उनमें सदाचार की शिक्षा को पहला स्थान दिया गया है। वह प्रारंभिक शिक्षा है उस पर जो इमारत खड़ी की जायेगी, वह टिक सकेगी।
...महात्मा गांधी


हिन्दी स्वराज्य (1909)सच्ची शिक्षा, पृष्ठ- 3-5

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3Comments
  1. प्रवीण जी,
    गांधीजी के इस लेख को प्रस्तुत करने के लिये आभार। ठीक सौ साल बाद इस लेख की हमारे सामाजिक परिपेक्ष्य में कितनी प्रासंगिकता है इस पर विचार की आवश्यकता है।

    सदाचार, नैतिकता के नियम पाठशाला में नहीं सिखाये जा सकते। वो पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहार से सीखे जा सकते हैं। लेकिन अक्षरज्ञान और किताबी ज्ञान के भी अपने मायने हैं।

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  2. अक्षरज्ञान तो टूल है। उससे आप भग्वद्गीता पढ़ो या पोर्नोग्राफी। च्वाइस इज योर्स!

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  3. आहा हा..मास्साब आज तो मजा आगया..हक्सले की कही बातॊं को पढकर तो आज निहाल होगये. बहुत बढिया और जनोपयोगी है आज की पोस्ट तो.

    रामराम.

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