Google वेब प्राइमरी का मास्टर

20.6.08

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शिक्षक संघ की राजनीति और उसमे लगे शिक्षकों की दिशा और दुर्दशा


पिछली पोस्ट में संजय शर्मा जी की टिपण्णी से दिमाग में दबी हुई बात निकल आई - शिक्षक संघ की राजनीति और उसमे लगे शिक्षकों की दिशा और दुर्दशा परबात थोडी अटपटी लग सकती है ,पर इस कड़वे सच को मैं भी मानता हूँ ,की राजनीति के दामन से कीचड को साफ़ करते -करते सरे शिक्षक नेता स्वयं कीचड के समान हो जाते हैं । इस पोस्टिंग में मैंने सोचा कि चलो इस पर भी अपनी बात कह ही डालते हैं। वास्तव में हमारे शिक्षक समुदाय में बहुत बड़ा अध्यापक वर्ग ऐसा है , जो शिक्षक नेताओं की मदद लेता रहता है और भविष्य में लेता रहेगा भी । इसी बीच के कड़ी में पड़ते हुए महत्वाकान्क्षा और पैसे की भूख से उस शिक्षक नेता को अपने पुराने आदर्श व वादे भूलने में आम राजनीति के धुरंधरों की ही तरह बहुत ज्यादा समय नहीं लगता है । आगे चलाकरi वह हर नेता कि तरह निपट भ्रष्टाचारी और अध्यापक के मूल कर्म से दूर होता जाता है , और उसकी मूल अध्यापक प्रवत्ति सिसकती ही रह जाती है ।
हालाकि ये सभी शिक्षक नेताओं पर लागू नहीं होता , पर अधिकांशतः के साथ यह कड़वा सच जुड़ा हुआ है। सर्व शिक्षा अभियान के दौर में शासन के नियमों के तहत भी बहुत बड़ी अध्यापक संख्या ( न्याय पंचायत व ब्लाक पंचायत समन्वयक के रूप में कार्य कर रहे ) ऐसी है ,जो स्कूली गुणा - भाग करते - करते अध्यापकों और शिक्षाधिकारियों के मध्य दलाली जैसे घ्रणित कार्य में शरीक हो जाती है। मजेदार बात बताऊँ कि सर्व शिक्षा अभियान कि एक बैठक में एक एक हमारे साथी का कहना था कि सर्व शिक्षा अभियान का नारा है - " सब पढ़े , सब बढ़ें " को बदल कर कर देना चाहिए - " सब खाएं , सब कमायें " । बताता चलूँ की इस अभियान में आंकडेबाजी की पूरी जिम्मेदारी इन्ही अध्यापकों के ऊपर ही होती है/
आप समझ ही रहे होंगे कि मैं यही कहना चाहता हूँ कि अध्यापक को को उसके मूल कर्म से विलग मत करिए नहीं तो वह बाबू हो जाएगा , दलाल हो जाएगा , भ्रस्टाचारी हो जाएगा , पर बेचारा अध्यापक कंहाँ रह पायेगा ? आशय मेरा आप समझ ही रहे होंगे? शिक्षक राजनीति को अपनी दिशा और दशा को तय करना ही होगा , वरना वह अब उस पुराने वैभव को न प्राप्त कर पायेगी / आखिर में मूल मंत्र बदलाव का वही पकड़ना पड़ेगा - कथनी और करनी में अन्तर न हो और पड़ से चिपकने की लोलुपता न हो /वास्तव में शैषिक गतिविधियों और आयामों में बहुत बड़ा अन्तर आ चुका है और इस दृष्टी से यदि कोई बदलाव हमारे शिक्षक नेताओं द्वारा न किया गया तो फ़िर ज़माने को अपनी राय को विपरीत रखने का पूरा अधिकार होगा ही/

18.6.08

प्राइमरी के मास्टर का एक और कदम ............




आज सुबह बैठकर चाय पी रहा था तो मेरे एक मित्र का फ़ोन आया की भाई आप तो हिट हो गए भाई! मतलब तो मैं नहीं समझ पाया , पूछने पर पता चला की मुझ जैसे नौसिखिये चिट्ठकार पर भी रवीश कुमार जी ( अरे भाई वही NDTV वाले ) ने "दैनिक हिंदुस्तान" ने अपने नियमित व साप्ताहिक कालम "ब्लॉग-वार्ता" में कुछ स्याही खर्च की है । तुंरत उठाकर पेपर को खोजा तो न चाहते हुए भी भी लगा की इस वर्चुअल वर्ल्ड में कुछ चिंगारी मेरी फैली जरूर है। हालाकि एक प्राथमिक विद्यालय का अध्यापक होने के नाते सामाजिक छवि के विपरीत होने की बात करने का साहस करना कभी - कभी बड़ा कठिन लगता है। हिन्दी टाइपिंग न जानना ,लिखने में संकोच, सरकारी मास्टर होने के बाद किस हद तक लिख सकता हूँ इस बात का डर? इस तरह के बहुत सारे डर के बावजूद भी आप यकीन जानिए की कुछ उपस्थिति का एहसास होना बड़ा ही सुखदायक व प्रेरणास्पद लगता है। आप यकीन जानिए की समाचारों की सुर्खियों में पढ़कर बड़ा आश्चर्य होता है , अपनी सामाजिक छवि के बारे में ।
आगे जरूर मैं चर्चा करूंगा ,सरकारी शिक्षा व्यवस्था में प्राईमरी के मास्टर की वास्तविक हैसियत की । वास्तव में कई अंतर्द्वंद है मेरे मन ,जिनकी चर्चा रवीश जी ने की है । प्राइमरी का मास्टर एक पहल है , शिक्षा क्षेत्र में लोकतंत्रीकरण व विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया की ।
प्राइमरी के मास्टर को हम किसी भी तरह से सरकारी लोक-लुभावन नीतियों का तथाकथित ग्रामीण सेवक नहीं बनना देना चाहते हैं। अरे भाई मास्टर को पढाने दो केवल !
खैर चलते चलते रवीश जी को धन्यवाद् ! आख़िर बड़े नामों का आशीर्वाद कंहीं न कंहीं असर तो डाल ही रहा होगा। चलते चलते आप सभी की सभी जरियों से प्राप्त सुझाओं व आशीर्वाद के लिए धन्यवाद् ।

13.6.08

कुछ ऐसे संदेश भी............


अक्सर हम अपनी कक्षाओं मे "रटने का अभ्यास" करते और कराते हैं । जबकि अभ्यास मे सृजनशीलता और नवीनता की संभावनाएं रहती हैं। इसमे किसी क्रिया को समझ और तर्क के साथ करने की गुंजाईश होती है।अभ्यास मे बच्चे की स्वयं-सक्रियता बच्चे को अधिक बेहतर तरीके से अधिगम प्राप्त करने का मौका देती है । इसके विपरीत रटना एक मशीनी क्रिया है। इसमे किसी बात को बगैर सोचे -समझे बार -बार दोहराना होता है। इसमे मस्तिष्क कम सक्रिय होता है। रटने की क्रिया मे बच्चा स्वयं पर केंद्रित नहीं कर पाता है। इसका दुष्प्रभाव यह होता है कि बच्चे का पढने की क्रिया से मन हट जाता है।
सीखने -सिखाने की हमारी योजनाओं मे बच्चों के लिए ढेरों संदेश होते हैं । बच्चों पर इनके असर के बारे मे हम लगभग जानते हैं , पर कुछ ऐसे संदेश भी हैं ,जो हमारे स्कूल के माहौल,अध्यापक के व्यवहार , बोल-चाल , चाल - ढाल , और हाव-भाव , मे मौजूद तो होते हैं पर अध्यापक को उनका आभास नहीं हो पाता हैंहमारी कोशिश यही होनी चाहिए कि हम उन संदेशों को समझ कर उसी के अनुसार अपनी योजनाये बना कर क्रियान्वित करने का प्रयास करें।

7.6.08

मूल्यांकन क्यों और किसका ?


यदि आप थोड़ा सा भी सोंचे तो पायेंगे कि मानव किसी न किसी रूप मे अपना मूल्यांकन करता आया है और उस मूल्यांकन के आधार पर अपनी जीवन दशा को निर्देशित करता आया है / हम यह भी जानते हैं की एक ग़लत मूल्यांकन किसी के भी जीवन को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है / फ़िर जब बच्चों की बात हो हो तो यह अति आवश्यक है की उनका मूल्यांकन सोच समझकर , कई अन्य महत्वपूर्ण बिन्दुओं को ध्यान मे रखकर किया जाए क्योंकि आपके और हमारे द्वारा किया गया बच्चों का मूल्यांकन , बच्चों की जीवन दशा को बदलने की क्षमता रखता है /
अभी तक मैंने जो भी बात कही वह बच्चों के इर्द - गिर्द ही रही है , परन्तु यह विचारणीय है की क्या वास्तव मे मूल्यांकन सिर्फ़ बच्चों का ही होता है ? आप और हम अपने दिन याद करें / आप को सिर्फ़ एक-दो शिक्षक ही क्यों पसंद आते थे और उन शिक्षकों द्वारा पढाये गए विषयों मे आप अव्वल आते थे , परन्तु अन्य विषयों मे उतने अच्छे नहीं थे / इससे कम से कम यह तो पता चलता है कि कमजोर आप नहीं थे परन्तु कहींकंही गडबडी तो हुई पर कंहाँ ? कैसे? क्या दोष शिक्षक मे था या शिक्षक द्वारा अपनाई गई शिक्षण पद्दति का या मूल्यांकन करने वाली विधि का या कँही और ?
यह गंभीर तथा विस्तृत विश्लेषण ही निर्णय देने का आधार बन जाएगा कि वास्तव मे बच्चा कितना सीख पाया / अगर कम सीखा तो क्यों और पूरा सीख गया तो कैसे ?
मूल्यांकन सम्बन्धी कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु पह्चाने जा सकते हैं :-
  • मूल्यांकन से निकली हर जानकारी का उपयोग किया जाए /
  • बच्चों को आपस मे भी मूल्यांकन करने का अवसर दिया जाना चाहिए /
  • शिक्षक अपने /अन्य विद्यालय के शिक्षकों के साथ बैठकर स्वयं का मूल्यांकन करे /
  • मूल्यांकन बच्चों मे एक कौशल के बाद दूसरा कौशल विकसित करने मे सहायक हो /
  • यह महसूस करना और कराना आवश्यक है कि मूल्यांकन भी पाठ्यक्रम का एक हिस्सा , इसे उभारना आवश्यक है /
  • मूल्यांकन बच्चों मे डर पैदा करने वाला न हो ,वरन इसे वे खुशी - खुशी स्वीकार करले / इसके लिए आवश्यक है की इसे पूर्ण व रोचक बनाया जाए /
  • प्रारम्भ मे ही यह स्पस्ट किया जन चाहिए की मूल्यांकन केवल बच्चों का ही नहीं होता वरन बच्चों द्वारा शिक्षकों का भी होता है / इसी प्रकार समुदाय द्वारा भी शिक्षकों , बच्चों की उपलब्धियों तथा स्कूल का समग्र मूल्यांकन किया जाता है/